Tuesday, September 29, 2015

रिशते

हथेलीयो पर आसानी से
रिशते कहॉ उगते हैं
कुछ टूटते लम्हो पर कैकटस
बनते है अौर कुछ कैक्टस बन
गुजरते लम्हो से टूटते हैं
हर जलजले मे रिशता मगर
मिठा ही है शहद सा
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रिशते जो आर पार है वो भी
बेहतर नहीं,निगाहो पर हैरानी
और खुदा पर शक की बात
होती है तब
आखिर खिडकीयो पर पर्दा
जरूरी हैं खुले सामान की
कोई कीमत नहीं

प्रेम

तुम मुझे मिलना धरती के उस छोर पर
जहॉ सागर चूम रहा होगा,धरती को
मिठे बोल से सागर को मिठा करेंगे
और चले जाएँगे ,प्रेम के उस पार


Thursday, September 17, 2015

नन्ही कविता

1) कुछ कच्चे पक्के से गुथे मन
   की कविता रच दी
   कुछ ने प्रेम की बात
    काग़ज़ पर पथरा दी
   कुछ ने प्रेम में भागी
   लड़की रच दी

   कोई उस किसान को क्यो.
   नहीं लिखता
   जो इस बार बारिश न होने
   पर अपनी प्रेमिका से नहीं मिल
   पाया ,वादा था कटाई के
    बाद मिलने का
    पड़े सूखे ने वादा सूखा
    दिया ,जैसे रेत में
   कोई अरमान प्यास
   से तरस कर दम
   तोड़ देता है
   किसान का प्रेम
  सूखा बादल जो आया तो
  था पर पन्नो पर
   कविता नहीं बन पाया

लंबे रास्ते पर खडे पेड
 खामोश है  मगर
 रस्सी गर्दन में
  लगाए झूलते है किसान के लिए

2)
वो  माँ कविता क्यो नहीं
होती जो २ रुपये गाँठ में लिए
बीमार बच्चे  को गोद मे लिए सोचती है
भगवान आज भी सवा रुपये में
चमत्कार करता है .. डॉक्टर
महंगेहै इस ज़माने के
3)
कविता वो दर्द क्यो नहीं
जो प्रेम के बिना उपजे है
जो पेट में मरोड़ की तरह
पड़ते है
साहब खाना देंगे, ४ दिन से नहीं खाया

4)
मैं कविता ही लिख रही हूँ
प्रेम नहीं.. पर है कविता
 सच है ये.. बस मेरा प्रेमी नहीं
इसमे और मैं भी नहीं,पेट के
 मरोड़ , खारे पानी वाली सच
  की कविता

Monday, August 31, 2015

प्रेम

जब मुट्ठी भर साँसे और कुछ टूटते लम्हो की
जिंदगी बची थी जिस्म अपने छिलके उतार
रहा था वो ज़मीन जिस पर लिपटकर सोता
था उस से प्रेम माँग रहा था
तुम मुझसे उस जगह मिलना ,जहाँ वो नदी
का पार है वहाँ मुझे पेड़ की तरह गाड़ दिया
जाएगा , और तुम मुझसे प्रेम लेकर जाना
और बाँट देना उन सब मे. जो प्रेम में
डूब कर मर गए थे कहना ,मैं प्रेम
वृक्ष हूँ
जब प्रेम की हुई कई क्रांतियाँ ख़त्म हो
जाएगी और तुम्हारी उंगली के बीच
बची जगह पर प्रेम उगने लगेगा
तब तुम, प्रेम की नई क्रांति करोगे
और बर्फ पर जाने वाले लोगो को
वो लकड़ी दोगे जो उन्हे उस मिट्टी के पहाड़ पर
चढने में मदद करेगी, और उनके
जगह जगह पर पड़े बूट के निशान में
प्रेम उगने लगेगा ,बर्फ पर पुहँचने
से पहले ,

Sunday, August 23, 2015

क्षणिकाएँ

खामोशी जलाती है.
कुछ नहीं मिल रहा है
न दर्द न प्रेम
अब कविता कैसे लिखूं
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शोर बहुत है आसपास
बस तू ज़रा बोल दे.
खामोशी का शोर दिल तक
जाता है
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लोग जाने क्या मुट्ठी में
दबाए घूमते है??
समुंदर,एक हथेली भर खारा पानी
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लो फिर आ गया दर पर
जितना जीना का सोचता है
उतनी ही प्यास बडती है.
ज़िंदगी बुझ रही है, प्यास में
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हज़ार इलाज़ लिए ज़िंदगी
जीने के , हज़ार वैद से
मिले ,पर किसी ने बुद्ध
बनने की दवा न दी
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सुना है बड़े संजीदा है लोग
अपनी अपनी मुहब्बत लेकर
दिल फिर भी कई
कहानियो से गुलज़ार है
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जब कुछ न हो कहने को तो
अपना ही किस्सा कह देते हैं
दुनियाँ का एक साज़ो सामान
आख़िर मैं भी तो हूँ
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चलो अब दर्द की गुहार ज़्यादा
न करो कुछ और लिखते है
आओ प्रेम प्रीत की बात करे
फिर बुद्ध हो जाए