Friday, February 17, 2012

रात


आओ कुछ  अंधेरो  से
बातें  कर  ले ..........
नींदों  को   चुराकर   
तकियों  में  भर  दें ||

ये  काली   काली  रातें  .......
चाँद  के  साथ  टहलती  हैं
झाड़ियों 
  जंगलों  से  छुपते -
छुपाते  सहर   की  किनारे  मिलती  हैं ||

आँखों  के  बंद  होते  बड़े  दरवाजों में 
तुम  जल्दी  से  छुप  जाओ ............
देखो  ना  रात  पर  भी  सूरज  का  पहेरा  हैं ||

Saturday, December 3, 2011

बादल

बादलो पर पड़ा एक
कहानी का टुकड़ा...
जो आँखों में काफी
देर रहा .....
और मुहँ का जायके
के संग बार बार
खेलता  रहा.... 

बादलो पर पड़ा एक कहानी
एक  टुकड़ा ...

उम्र उस बादल के संग
चलती रही ...
नमकीन पानी
बरसता रहा ..
पर वो बदल का
बुनकर न आया

बादलो पर पड़ा एक कहानी
एक टुकड़ा ...

क्या पता था
की कहानी कुछ
यूँ  बदलेगी ..
में ज़मीन पर
रही..
वो असमान में
नया बादल बुनता
रहा ....

बादलो पर पड़ा एक कहानी
एक टुकड़ा ...








Wednesday, October 12, 2011

मकान

तनहा  सा ,
सुनसान गली में खड़ा ,
एक मकान
जिसकी सीडियों से 
चड़ता अँधेरा ,
मकान को डराता
धमकाता...अँधेरा 

गलियों से जाते
हर एक मेहरबान  
को डर डर के
डराता ये मकान ..

न जाने कब किसका
घर था ..
मगर आज दूसरे की
दी हुई उधार रोशनी का  
मुहताज मकान  ..

बेचारा मूक , शांत सा
खड़ा वो मकान .... 


Sunday, August 28, 2011

फेसबूक


बेकार के दीवाने थे
बेकार का छुपाना था
न जाने क्यो गलियो
से छुप-छुप निकला करते थे
अजब सा पागलपन था ....
माँ के आँचल में बेठ
माँ की आज़ादी के
सपने बुनते थे
एक माँ को बिन
बोले दूसरी माँ के लिए
जान पल मे दे देते थे...
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काश की आज़ादी के
वक़्त भी फेसबूक होता
हर दो कदम पर दीवानो का
कुछ और स्टेटस होता
जान देने से पहले गले में
फंदा लगाकर फोटो लेते
और फसेबूक पर सबकी कॉमेंट पढ़ते
;)