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Tuesday, October 7, 2014

दौड़

सब भीड़ मे दौड़ रहे
रहे है न जाने किस चाहा में
न जाने किस उलझन में
ज़िंदगी
घर की छत पर मकड़ा
व्यस्त है जाल बुनने में
सभी रिस रहे है थोड़ा थोडा

Monday, October 6, 2014

साहूकार

इस बार की दिवाली पर
मुझे  साहूकार ढूँढना  होगा
करने होंगे कुछ सौदे  ,उसके साथ ,
जिससे दिया  जलाऊँ , मैं
दिल के

कह दूँगी ये मन रखकर
कुछ बेमतलब की हंसी और
ठहाके  मुझे दे दो , बहुत दिन हुए
जोर से हँसे हुए

 बेकार के बेवजह के
रिश्तो में सब जमा पूंजी खर्च
कर दी है कुछ भी बचा  नहीं
बनते बिगड़ते रिश्तो  के 
खेल  में, ये  समझता ही नहीं
तो ऐसा किस  काम का ये  मन 

सोचती हूँ  बेच ही दूँ   कही 
कोई अच्छे  दाम ही मिल जाए


क्या कोई साहूकार पता है तुम्हे  ??

Friday, October 3, 2014

भूल जाती हूँ न

मैं सब भूलने
लगी हूँ, भूल जाती हूँ
की मैं क्यों कमरो के
दीवालो से बात कर रही हूँ
क्या चाहिए था जो उनसे 
पूछ रही हूँ भूल जाती हूँ न
जब तुम आवाज़ देते हो तो
तुम्हारे बिखरी
आवाज़ो को समेटना
भूल जाती हूँ धड़कन
को सुनना या
किसी कोने से
आवाज़ देकर,जब
कहते हो की तुम्हे
मुझसे प्यार है
तब सोचती हूँ क्या
जवाब दूँ
"क्या सचमुच
मुझे तुमसे प्यार है " ...

Sunday, January 5, 2014

तुम

हर आती जाती साँस
के अंतराल में ,तुम 
कही ठहरे रहते हो
तुम साँस फूकते हो 
तब में साँस लेती हूँ 

Sunday, October 6, 2013

सरल -कठिन

निर्मल, पारदर्शी
पानी बह जाता है
कुछ भी तो नहीं
न आर न पार

सरल बहुत सरल..

***********
कुछ भी न रहना
कुछ भी न होना

कठिन बहुत कठिन

Saturday, December 1, 2012

जोगी

जोगी बन, वन वन फिरया 
न ही खुदा लाधया 
न ही माया ..
छडया घर, लभड वास्ते 
कोड़ा सोना भी गया हथ से 
पारस तो कदे मिलया ही नहीं 
आत्मा भी रोज़ धोअड़ जाता है ..
नादिया का पाडी पर मेला 
क्या धोवंगा अब 
न जाडे घडी चीजों 
पर मेल लगी है 
जो कभी धुप में सुखड डाले अंग 
तो धुप भी काली पड़ गयी 
मन खुला तो .. सब घर 
फेल गया .. ..

जोगी बेचारा ऐसा न 
घर मिलया ..
न जंगल ही ने, थले विच 
बिठाया ......

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Hindi translation ..


जोगी बन, वन वन घूमा 
न ही खुदा मिला 
न ही माया ..
छोड़ा घर, ढूढने के लिए 
झूठा सोना भी गया हथ से 

पारस तो कभी मिला ही नहीं 
आत्मा भी रोज़ धोने जाता है ..
नदी का पानी पर मेला 
क्या धोएगा अब 
न जाने कितनी चीजों 
पर मेल लगी है 
जो कभी धुप में सूखने डाले अंग 
तो धुप भी काली पड़ गयी 
मन खोला तो .. सब घर 
फेल गया .. ..

जोगी बेचारा ऐसा, न 
घर मिलया ..
न जंगल ही ने, अपने आंगन 
में बिठाया ......

Hindi translation ..

Tuesday, May 29, 2012

उलझन

उलझन में है मन मेरा
की रहा दिखे ना ..मन को
कैसे बहलाओ ..की ख़यालो
की माला मन से छुट्त ना ..
दामन थाम मेरा ...........
आ घुस बैठे है ..............
घुसबैठिए ...................की
कोई तरकीब कहो....कैसे
छोड़ आओ चोकट के पार
तिनको..........चंचल हो मन
हवा से बहता जाए.....बयार
को कैसे बांधो की वो ......
मेरी आँगन की हो जाए |||

Friday, February 17, 2012

रात


आओ कुछ  अंधेरो  से
बातें  कर  ले ..........
नींदों  को   चुराकर   
तकियों  में  भर  दें ||

ये  काली   काली  रातें  .......
चाँद  के  साथ  टहलती  हैं
झाड़ियों 
  जंगलों  से  छुपते -
छुपाते  सहर   की  किनारे  मिलती  हैं ||

आँखों  के  बंद  होते  बड़े  दरवाजों में 
तुम  जल्दी  से  छुप  जाओ ............
देखो  ना  रात  पर  भी  सूरज  का  पहेरा  हैं ||