मैं सब भूलने लगी हूँ, भूल जाती हूँ की मैं क्यों कमरो के दीवालो से बात कर रही हूँ क्या चाहिए था जो उनसे पूछ रही हूँ भूल जाती हूँ न
जब तुम आवाज़ देते हो तो तुम्हारे बिखरी आवाज़ो को समेटना भूल जाती हूँ धड़कन को सुनना या किसी कोने से आवाज़ देकर,जब कहते हो की तुम्हे मुझसे प्यार है तब सोचती हूँ क्या जवाब दूँ "क्या सचमुच मुझे तुमसे प्यार है " ...
जोगी बन, वन वन फिरया न ही खुदा लाधया न ही माया .. छडया घर, लभड वास्ते कोड़ा सोना भी गया हथ से पारस तो कदे मिलया ही नहीं आत्मा भी रोज़ धोअड़ जाता है .. नादिया का पाडी पर मेला क्या धोवंगा अब न जाडे घडी चीजों पर मेल लगी है जो कभी धुप में सुखड डाले अंग तो धुप भी काली पड़ गयी मन खुला तो .. सब घर फेल गया .. ..
जोगी बेचारा ऐसा न घर मिलया .. न जंगल ही ने, थले विच बिठाया ......
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जोगी बन, वन वन घूमा न ही खुदा मिला न ही माया .. छोड़ा घर, ढूढने के लिए झूठा सोना भी गया हथ से पारस तो कभी मिला ही नहीं आत्मा भी रोज़ धोने जाता है .. नदी का पानी पर मेला क्या धोएगा अब न जाने कितनी चीजों पर मेल लगी है जो कभी धुप में सूखने डाले अंग तो धुप भी काली पड़ गयी मन खोला तो .. सब घर फेल गया .. ..
जोगी बेचारा ऐसा, न घर मिलया .. न जंगल ही ने, अपने आंगन में बिठाया ......
उलझन में है मन मेरा की रहा दिखे ना ..मन को कैसे बहलाओ ..की ख़यालो की माला मन से छुट्त ना .. दामन थाम मेरा ........... आ घुस बैठे है .............. घुसबैठिए ...................की कोई तरकीब कहो....कैसे छोड़ आओ चोकट के पार तिनको..........चंचल हो मन हवा से बहता जाए.....बयार को कैसे बांधो की वो ...... मेरी आँगन की हो जाए |||