Sunday, January 20, 2019

गोथरी

मैने एक गोथरी बनाई थी
जिसमे कुछ हाथ से खिसकते
लम्हो का पेबंद लगाए थे
और उसमे चुपके से, तेरे
गिरती हँसी को और तेरी मुस्कराहट
को हथेली मे छुपा कर, वहाँ डाल आती हूँ
 वो गोथरी  मैने अपने
कमर के बाए तरफ बाँध रखी

जब कभी मन उदास होता है
तब उसे दाएँ हाथ से निकाल कर
दोनो हाथो की हथेलिया खोल तेरी
हँसी से भर लेती हूँ

Tuesday, June 19, 2018

नोट माई बाइयोलॉजिकल फादर


पता नहीं वो कौन थे कम से कम मेरे पिता नहीं थे ना ही मेने उनके साथ सालो बिताए की उन्हे पिता के रूप में देखो|
पर किसी से जुड़ने के लिए हज़ारो सालो का रिश्ता होना ज़रूरी है क्या ?
ज़रूरी है क्या की हम उन्हे खून के रिश्ते से ही जाने या फिर कोई नाम देकर ?
हम किसी के साथ जुड़ने से पहेले रिश्ते का नाम ढूंढते है, बुरी आदत है
पर ये उतनी ही सच की हम रिश्तो को नाम दिए बिना आगे नहीं बड़ पाते और उतना ही सच है ये भी की कुछ रिश्तो के नाम कभी नहीं होते ,शायद होना ज़रूरी भी नहीं|
उन दिनो जब मैं नौकरी के लिए अपने माँ-पिता से दूर रहती थी तभी मेरा फ्रॅक्चर हो गया था
तभी कुछ वक़्त पहेले ही में एक बुजुर्ग कपल से मिली थी बातों बातों में पता चला मेरा शहर आंटी के शहर का पड़ोसी है ,पड़ोसी एक दूसरे से दूर दराज़ शहर में बिछड़े पुराने दोस्तो के जैसे मिलते है और बाद में पता चला की वो घूम फिर के रिश्तेदारी में भी है कितनी छोटी है ये दुनियाँ ..है ना
खैर ,उनका प्यार मेरे लिए था और फिर तो धीरे धीरे बडने लगा और उन्होने खुद को मेरा गार्डियन बना लिया |
रिश्ते खूबसूरत होते है पर तब तक ही जब तक बिना माँग के रिश्ते जी रहे है प्यार और प्यार के बदले प्यार इतना ही हो तो शायद थोड़ी आसान हो जाती है ज़िंदगी, पर ऐसा हो जैसा हमने सोचा तो फिर क्या ...
हां ,तो मेरा फ्रॅक्चर हो गया और जैसे अंकल जी को पता चला वो मुझे लेने आ गये | आहा ! कितना बड़ा दिल होगा उनका , मैं आज भी सोचती हूँ मुझसे मेरी पूरी जानकारी की बिना अपने घर बेड रेस्ट के लिए गये | क्या आसान है किसी को बिना जाने इतना प्यार करना ?
वो मेरे साथ पूरे वक़्त बने रहे ,मेरे डॉक्टर से लेकर दवाईयाँ सबका ही ध्यान रखते थे ,यहाँ तक की खाना, आंटी के ना होंने पर बनाकर खिलाना जैसा काम भी किया करते थे
|
कभी कभी तो ये आलम होता की में उनके साथ किचन में खड़े होकर खाना बनाती ,बावजूद इसके की मेरे पैर का प्लास्टर मुझे इस बात की पर्मिशन नहीं देता था तब वो मेरे लिए एक कुर्सी का इंतज़ाम करते और हम दोनो पता नहीं क्या दुनियाँ भर की बातें कर वक़्त का खर्चा करते थे
कब वक़्त बीत गया पूरा महीना ख़त्म ,पता ही नहीं चला कभी|
वहाँ से मेरे जाने का वक़्त आने लगा ,मुझे अपना काम भी वापस शुरू करना था जो महीने भर से छुट्टी पर था मुझे वहाँ से जाने की तैयारी शुरू करनी पड़ी | वो उदास थे उन दिनो ,बातें कम कर दी थी देखकर बस चले जाते | क्या कहती मैं उनसे ,की मैं आती रहूंगी या ये की अब पता नहीं मैं कब फ़ुर्सत निकालोंगी उनसे इतनी लंबी बातें करने के लिए | कुछ नहीं था कहने को ,बस मैने भी उन्हे देखा और सिर्फ़ देखकर
छोड़ देती थी
वहाँ से जाने के बाद फोन पर बात करती थी पर शायद तब भी उदासी ठहरी ही रहती | मैं उनके लिए बदले में कुछ नहीं कर पाई ,कुछ भी नहीं|
वो मेरे पिता नहीं थे पर उनकी आँखों को बेटी की तलाश हमेशा से थी ऐसे बेटी जिसके साथ वो उसकी आँखों से दुनिया को बड़ा होता या बदलता देखना चाहते थे हर बाप की तरह वो अपनी बेटी का एक सुरक्षा कवच बनकर घूमना चाहते थे
खाविशे रंगो के बिना होती है पर पूरी होनी पर हरा रंग भरती है मन में और बिखरने पर उदासी का ...नहीं पता वो रंग क्या होता है पर उम्मीदे कभी पूरी होती है क्या ??
वो कुछ महीनो का रिश्ता था पर गहरा था ना तमाम उमर गुज़ार सके साथ में , ना ज़्यादा बातें की पोटलिया खुली ,वक़्त अपनी चाल से बदलता रहा और हमे अलग करता गया | रेशा रेशा उधड़ा ,परत दर परत वक़्त की निकलती गयी | फिर हुआ वो,जैसे कहते है ना हर एक चीज़ खुद के साथ गिनकर साँसे लाती है और साँसे ख़तम होने पर कितने भी ऑक्सिजन टेंक् लगाए जाए वो साँस वापस नहीं आती |
वो अपने हालत से मजबूर हो गये हर बार चाहकर भी मुझसे मिलना, नहीं मिल पाए ,सब राज़ को बेपर्दा नहीं किया जा सकता तो वो राज़ भी पर्दे में रहा की उन्होने मुझसे मिलना क्यो छोड़ दिया |
साल के कुछ महीने जो खूबसूरत कहा जाता , ये चन्द महीने उन में से थे .............
वो मेरे पिता नहीं पर फिर भी मैं उन्हे फादर्स दे पर याद करती रही ,उनकी चमकदार आँखें और बड़ी बड़ी मूँछे मुझे बहुत याद आई
आप मेरे दिल में हमेशा रहेंगे

Tuesday, July 5, 2016

ख्वाहिश

सुनो ,कभी उन ख्वाहिशो
को पानी दो,जो अभी तक
जन्मी नहीं और कभी उनका
जो तुम्हारी साँसो में कही
छुपी हैं तुम में रेंगती हैं
कहीं तुम मे ठहर जाती हैं
और कभी कुछ छूटने
पर छम से टूटकर
तुम ही तोड जाती हैं

ख्वाहिश हैं मेरी ,ख्वाहिशो को
थोड़ा - थोड़ा सजा दो, उस पार
खड़ा मन ,अभी इन्तजार में हैं उसके

Friday, April 22, 2016

सपने में कई रंग भरे हैं

तेरी गलियो को छोड़ ,मैं अब उस जगह खड़ी हूँ,
जहाँ न तेरा दर है न कोई गली
अंधेरे का टुकड़ा,मेरी छाया को समेटे
खड़ा हैं ,
मैने हथेली पर या और खुद को समेटकर
उस पहाड़ी पर चढ रही हूँ जहाँ से
बादलो में
छुपा सूरज अंधेरे
को खाकर ,
डकार मार
आसमान मे मुस्कराकर
ठहर जाता हैं
सपने में कई रंग भरे हैं smile emoticon

Tuesday, April 19, 2016

सागर सा शान्त

कभी कितना खूबसूरत सा लगता है
तन्हा रहना ,किसी से शिकवा नहीं
न ही उम्मिद, न रूठना,न मनाना
कई बार खुद का न होना भी
मुझे अपने भीतर तक भर देता है
मैं हर पल उत्सव मे हूँ
इसलिए नहीं कि मैंने कुछ
पा लिया,बल्कि इसलिए
कि खोना मेरे लिए आसान रहा
तुम्हे पाने से कहीं ज्यादा।
सुनो,मन कभी कभी बहुत
गहरे सागर सा शान्त बहता है

Thursday, April 7, 2016

दिल में ही कही हैं

कुछ किस्से कभी बयान नहीं
होते ,कुछ दर्द की जमीन
नहीं होती
धड़कने फिर भी दर्द के
धागे से ही सिली जाती हैं
सुन ,तू दिल में ही कही हैं बाकी

चमकते ठोस मोती

साँसे जब गुलाम होने के लिए तरस
रही थी और
बकरीयॉ घास चरकर इन्तजार
कर रही उस रात का ,जब सब
खत्म होने वाला हैं 
वो मन भी ,जो घास के कोरो पर
उगने लगता है,एक चमकती
ओस की बूंद की तरह..
वो गड़रिया भी ,जो रोज
बकरीयों को मन चराने
आता है और वो रात
भी जो ओस बनकर
घास की कोरो पर
ठहर जाती है
सब एक दिन खत्म
हो जाएगा ,शेष रह
जाँएगे,चमकते ठोस
मोती
घास की कोरो पर..

शहद

जब प्रेम की चिट्ठी वो बाँच रहा था 
उसे मालूम न था आँख की कोरो 
पर ठहरा पानी ,खारा पानी नहीं ,
प्रेम की शहद हैं

साँसे

जिन्दा रहने के लिए
कुछ यादों का होना
जरूरी है
चन्द साँसे उस सन्दूक 
मे रख आई हूँ जहाँ
तुम्हारी यादे साँसे
ले रही हैं

इन्तजार...

जिन्दगी आसानी से कहाँ चलती है वो अपने हिसाब से सारे रास्ते ढूढं लेती हैं बहती रहती हैं एक कल कल करती हुई नदी की तरह ,जिसे पता भी नहीं किस तरफ मुड़ना हैं अगला कौन सा मोड़ हैं
जिने के लिए सब वजह ढूढंते हैं पर कई बार कोई भी वजह नहीं होती पर बेवजह आप प्रेम मे पड़ जाते हो ,और लगता हैं जिन्दगी को रफ्तार मिल गई ,वो ऐसा सोच ही रहा था कि चलती गाड़ी की रफ्तार बड़ गई और सब आँखो से बहने लगा ... क्या वो सच में प्यार मे था दर्द रिस रहा था वो पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहता था
किसी मोड़ पर वो उसकी जिन्दगी में आकर ठहर गई थी यूँ खामोश उसे देखता रहा ,जैसे जिन्दगी ने आकर उसकी झूली फूलो से भर दी ..पता नहीं जिन्दगी कब कहाँ आपके दामन के लिए प्यार लेकर खड़ी हो ,कौन सा मोड़ आपके दिल की तरफ मुड़े.. तमाम दर्द से गुजरती हुई नदी को प्रेम एक ठंडे झूके सा छू जाता हैं
प्रेम ही है जो न जाने कब आता हैं न जाने कब जाता हैं जिसे आने से कोई रोक नही सकता तो उसके जाता देखकर रोक भी नहीं सकते ।
कोई मोड़ प्रेम को ठहरा सकता तो जाने वाले रास्ते कभी नहीं बने होते ।
वो ज़ार जांर रोया पर जाने वाला चला गया ..
कुछ थोड़ी नहीं बदला ,बस ,आँसू दिल मे बर्फ की तरह जम गए ,और हर साँस से ठंड़ी अहा निकलती रही ।
प्रेम की कोई गली नहीं जिसमे बैठकर कोई किसी को आवाज दे और कोई झट से बाहर आए... वो रास्ते हैं जिस पर खामोशी पसरी रहती हैं खामोशी की आवाज बुहत तेज होती हैं पर सुनता फिर भी कोई नहीं
खैर गाड़ी गन्तव्य तक पुहंच ही जाती है कभी टूटी यादों के साथ तो कभी प्यार मे..
तुम मुझ से वहाँ मिलना
जहॉ समुन्दर के दो किनारे न हो
और न ही धरती प्यासी हो अम्बर को चूमने के लिए
इन्तजार...

फुरसत

कुछ किस्से कहानीयॉ ,
जेबो में मैनै भी रखी हैं
फुरसत की हैं वो सब,
बस एक फुरसत ढूंढ रही हूँ जिने के लिए

चमक

वक्त ने जलाकर खाक पहला दिन  किया। 

रफ्ता रफ्ता दिल बहल रहा है फिर दुनियाँ
के तमाशो से,डर हैं फिर कहीं जले सूरज की
राख आसमान को काला न कर दे और मन
टिमटिमाते सितारो को देख अपनी
चमक ढूंढने लगे...

Intolerance

नेताओ की राजनिती खूब हैं tolerance उनकी जवाब दे रही हैं और इल्जाम जनता पर...
मेरे पड़ोस में रह रहे खान भाई अपनी दो बिवीयों मे उलझे हुए।और वो शर्मा जी आफिस के कामो से निपटकर, शाम को चढया हुआ हैंगओवर से सुबह आजाद होने के रास्ते ढंढते हैं
वो औरत जो सड़क पर मटके बेचती हैं ३ बेटियों के बाद बेटा आएगा या नहीं इसमे उलझी हैं और मटका बिना धर्म पूछे ,बेच देती हैं 
पता हैं जब कभी मैं अपनी बेटी को बस स्टोप पर छोड़ने जाती हूँ तब मुनसिपल स्कूल के ४-५ बच्चो को एक साथ अखबार में झाकँते देखती हूँ धर्म की बात नही करते ,अखबार में बिखरी असहिष्णुता देखते हैं पर साथ - साथ में
अरे हॉ वो खान भाई हैं न वो इडिया पकिस्तान के मैच में इडिया के जीतने पर सबसे पहले वो मुहँ मिठा कराते हैं
चलो कुछ नया करते हैं आओ थोडं से और बडे़ हो जाए||

ये लिखा गया था मेरी डायरी में ४ Nov 2015  को 

आसान सूद

जिन्दगी को आसान सूद पर रखा हैं
बार -बार ये न पूछो अब क्या होगा

Tuesday, November 3, 2015

दिल की ज़मीन

कुछ किस्से कहानियाँ दिल
के अंदर ही पनपा करती है
और वही सुखकर झड़कर
राख बन जाते है
दिल की ज़मीन को भी खाद चाहिए...

Monday, November 2, 2015

शब्दो का जायका

कुछ पक्के रंग ,शब्दो के, जायका बन
जुबान पर बरसो तक ,ठहरे रहते हैंं
रंगरेज से कहो ,जुबान चाशनी से धोये

Thursday, October 15, 2015

बुद्ध

प्यार ,किफायत वक्त की जरूरत हैं
मसरूफियत बुद्ध गढती हैं
बुद्ध को प्यार हुआ़...कहानी थी, पगली

Tuesday, September 29, 2015

रिशते

हथेलीयो पर आसानी से
रिशते कहॉ उगते हैं
कुछ टूटते लम्हो पर कैकटस
बनते है अौर कुछ कैक्टस बन
गुजरते लम्हो से टूटते हैं
हर जलजले मे रिशता मगर
मिठा ही है शहद सा
†****†*******†******
रिशते जो आर पार है वो भी
बेहतर नहीं,निगाहो पर हैरानी
और खुदा पर शक की बात
होती है तब
आखिर खिडकीयो पर पर्दा
जरूरी हैं खुले सामान की
कोई कीमत नहीं

प्रेम

तुम मुझे मिलना धरती के उस छोर पर
जहॉ सागर चूम रहा होगा,धरती को
मिठे बोल से सागर को मिठा करेंगे
और चले जाएँगे ,प्रेम के उस पार


Thursday, September 17, 2015

नन्ही कविता

1) कुछ कच्चे पक्के से गुथे मन
   की कविता रच दी
   कुछ ने प्रेम की बात
    काग़ज़ पर पथरा दी
   कुछ ने प्रेम में भागी
   लड़की रच दी

   कोई उस किसान को क्यो.
   नहीं लिखता
   जो इस बार बारिश न होने
   पर अपनी प्रेमिका से नहीं मिल
   पाया ,वादा था कटाई के
    बाद मिलने का
    पड़े सूखे ने वादा सूखा
    दिया ,जैसे रेत में
   कोई अरमान प्यास
   से तरस कर दम
   तोड़ देता है
   किसान का प्रेम
  सूखा बादल जो आया तो
  था पर पन्नो पर
   कविता नहीं बन पाया

लंबे रास्ते पर खडे पेड
 खामोश है  मगर
 रस्सी गर्दन में
  लगाए झूलते है किसान के लिए

2)
वो  माँ कविता क्यो नहीं
होती जो २ रुपये गाँठ में लिए
बीमार बच्चे  को गोद मे लिए सोचती है
भगवान आज भी सवा रुपये में
चमत्कार करता है .. डॉक्टर
महंगेहै इस ज़माने के
3)
कविता वो दर्द क्यो नहीं
जो प्रेम के बिना उपजे है
जो पेट में मरोड़ की तरह
पड़ते है
साहब खाना देंगे, ४ दिन से नहीं खाया

4)
मैं कविता ही लिख रही हूँ
प्रेम नहीं.. पर है कविता
 सच है ये.. बस मेरा प्रेमी नहीं
इसमे और मैं भी नहीं,पेट के
 मरोड़ , खारे पानी वाली सच
  की कविता