Friday, November 28, 2014

यूँही बहता मन

धागे को  बुनने वाले न जाने कितने
ताने बाने , सब उलझे एक दूसरे से
 किस ख्याल को धागे से बाँध
गाँठ लग दूँ , ख्याल भी उलझे उलझे
ताने बाने से और मजबूत धागे
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कुछ किस्से यूँ बयान नहीं होते
जहन  को टटोलना होता है
रात भर वो लोहे का संदूक
छान  मारा तुम्हारी  एक  पुरानी
तस्वीर के लिए..... 
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लाइलाज गम रहा तुम्हारा जाना
हज़ारो चोट खाई मैंने ,
इस एक गम को  छुपाने के लिए 
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आज भी कोई सन्देश उस अमरुद
के पेड़ की शाख पर अटका है
जिस शाख पर बैठ, तुम मुझे
चिड़ाते थे... 
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किस्से  कहानी  जहां रोज़  बहा
करते थे आज वहां सिर्फ पानी हैं
कितनी कहानी कितने नींद  में
ऊंघते  वाले हम्म , पानी में
बह  गए..... 
कल शहर की नदी से सीप मिला
मुझे। . 
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ग़ाँव उजड़ गया तूफ़ान में
साँसे उधार ले  राखी है उसने ,
 उस सूदखोर  से 
कब आओगे तुम , क़र्ज़ चुकाने 

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आहा तुम्हारी बातेँ  एक ठंडी बयार
मन को बाहा ले जाए.....
गर्मी में लूँ क्यों बहती है


यूँही 
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